नाद (ध्वनि) अंतःकरण में प्रवेश कर फिर बाहर निकलता है। जिससे ब्रह्म की उत्पत्ति होती है, इसलिए नाद को परम माना गया है।
यह कथन भारतीय नाद-दर्शन की एक गहरी आध्यात्मिक अवधारणा को व्यक्त करता है। इसे सरल रूप में ऐसे समझ सकते हैं:
“नाद” केवल बाहर सुनाई देने वाली ध्वनि नहीं है। जब कोई स्वर उत्पन्न होता है, तो उसकी अनुभूति पहले हमारे अंतःकरण—मन, बुद्धि और चेतना में होती है। साधना और संगीत के माध्यम से यही नाद भीतर की चेतना को स्पर्श करके पुनः बाहरी अभिव्यक्ति के रूप में प्रकट होता है।
यहाँ “ब्रह्म की उत्पत्ति” का अर्थ यह नहीं कि ध्वनि से भौतिक रूप से ईश्वर का जन्म होता है। भारतीय दर्शन में ब्रह्म परम चेतना या परम सत्य का प्रतीक है। इसलिए नाद को “परम” कहा गया—क्योंकि गहन नाद-साधना में साधक बाहरी ध्वनि से आगे बढ़कर आंतरिक मौन और परम चेतना का अनुभव कर सकता है।
इसी विचार को प्रसिद्ध सूत्र “नाद ब्रह्म” में संक्षेपित किया जाता है—
“नाद ही ब्रह्म है”, अर्थात् ध्वनि को परम चेतना तक पहुँचने का एक मार्ग माना गया है।
संगीत की दृष्टि से कहें तो:
स्वर बाहेरून कानावर पडतो, पण त्याचा खरा प्रवास अंतःकरणात होतो. तिथे नाद केवळ ऐकू येत नाही—तो अनुभवला जातो.
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