राग जोग… जैसे रात्रि की नीरवता में मन का कोई गुप्त संवाद।
यह राग संध्या से रात की ओर बढ़ते उस क्षण का साक्षी है,
जब दिन की चहल-पहल धीरे-धीरे मौन में विलीन हो जाती है।
आकाश में चाँद की शीतलता उतरने लगती है,
और मन अपने ही अंतराल में डूबने लगता है।
जोग की हर सुर लहर जैसे किसी साधक की प्रार्थना हो—
कोमल गांधार की मिठास,
और शुद्ध गांधार का उजास,
मिलकर एक अद्भुत भाव-जगत रचते हैं।
इसमें विरह भी है, पर व्याकुलता नहीं…
इसमें शांति भी है, पर नीरसता नहीं…
यह एक ऐसा मधुर संतुलन है,
जहाँ आत्मा अपने आप से मिलती है।
जब राग जोग गूंजता है,
तो लगता है जैसे कोई योगी गहन ध्यान में बैठा हो,
बाहरी संसार से परे,
अंदर की अनंत ध्वनि— नाद ब्रह्म —को सुनता हुआ।
यह राग न केवल संगीत है,
बल्कि एक अनुभूति है—
एक यात्रा…
स्वयं से स्वयं तक। 🌙🎶
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