राग पूरिया धनाश्री — संध्या का एक गंभीर, गूढ़ और आत्मा को छू लेने वाला स्वर-विन्यास।
जब दिन ढलने लगता है,
और आकाश के केसरिया रंग धीरे-धीरे नीले अंधकार में घुलने लगते हैं,
तभी कहीं दूर से उठती है — पूरिया धनाश्री की अलौकिक पुकार…
यह राग मानो सूर्यास्त की अंतिम किरण हो,
जो धरती को छोड़ने से पहले
हर हृदय में एक अनकही विरह की लहर जगा जाती है।
इसके कोमल और तीव्र स्वरों में
एक अधूरी चाहत की कंपकंपी है,
जैसे कोई प्रतीक्षा में खड़ा हो
किसी प्रिय के आने की राह देखता हुआ…
पूरिया धनाश्री गाती नहीं —
वह मन के अंतरतम में उतरती है,
विचारों को मौन करती है,
और आत्मा को अपने ही स्वर में विलीन कर देती है।
यह राग संध्या की उस घड़ी का साथी है,
जहाँ न दिन पूरी तरह विदा हुआ है,
न रात पूरी तरह आई है —
बस एक मधुर, रहस्यमयी ठहराव है…
इसके आलाप में छिपा है एक गहरा ध्यान,
एक विरह की तपस्या,
और एक ऐसी शांति
जो शब्दों से परे है।
पूरिया धनाश्री —
मन की संध्या में बजने वाला वह अनंत संगीत,
जो सुनाई नहीं देता…
बस महसूस होता है।
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