राग दरबारी…
मानो रात्रि की गहराइयों में उतरता हुआ कोई गंभीर चिंतन हो…
गहन अंधेरी रात का शांत आकाश,
जहाँ हर स्वर धीमे-धीमे साँस लेता है,
वहीं जन्म लेता है दरबारी—
गंभीरता का सजीव रूप, भावों का महासागर।
उसकी कोमल गांधार और धैवत
जैसे मन के भीतरी कोनों को छूते हुए
एक अनकही वेदना को जागृत करते हैं,
और फिर उसे धीरे-धीरे शांति में विलीन कर देते हैं।
यह राग न हड़बड़ी जानता है, न चंचलता,
यह तो राजदरबार की गंभीर गरिमा लिए
धीरे-धीरे अपनी महिमा प्रकट करता है—
जैसे कोई ज्ञानी संत मौन में ज्ञान दे रहा हो।
हर मींड, हर आंदोलित स्वर
मानो समय को थाम लेता है,
और श्रोता को भीतर की यात्रा पर ले जाता है,
जहाँ शब्द नहीं, केवल अनुभव होता है।
दरबारी…
वह राग है जो रात की निस्तब्धता में
मन के सबसे गहरे प्रश्नों को छूकर
उन्हें एक शांत उत्तर दे जाता है।
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