जो साहित्य की सुगंध से अनजान है,
जो संगीत की सरिता में कभी नहीं बहा,
जो कला के रंगों से अपने मन को नहीं सजा पाया—
उसका जीवन मानो बिना स्वर की वीणा,
बिना पुष्प का उपवन और बिना चाँदनी की रात है।
साहित्य, संगीत और कला ही वे दीप हैं
जो मनुष्य को केवल जीवित नहीं रखते,
बल्कि उसे सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं।
— वेदांग बी. धाराशिवे
ग्राम संगीत सभा, आलमला 🎶🌿✨
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