ग्रामोफोन के कारण संगीत के कलाकारों की कला को वर्षों तक के लिये सुरक्षित रखना संभव हुआ। भातखण्डे जी ने भी ग्रामोफ़ोन का प्रयोग चीज़ों के संकलन करने हेतु किया। उनके रिकॉर्ड एक अमूल्य निधि के रूप में संगीत के इतिहास में बेजोड़ हैं। उसके पश्चात टेपरिकार्डर से आज के डीजिटल उपकरणों तक बदलाव हो रहा है।
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रागों के संरक्षण हेतु भिन्न-भिन्न परम्पराओं, बानियों, एवं घरानों का अमूल्य योगदान रहा है। जहां नौहार, खंडहार, डागुर व गोबरहार बानियों द्वारा ध्रुपद व धमार शैली की परम्परा का निर्वाह हुआ वहीं खयाल शैली में आगरा, ग्वालियर, दिल्ली, पटियाला, जयपुर आदि-आदि घरानों की मुख्य भूमिका रही है।
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